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  #31  
Old 22nd February 2016
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GUDIYA
 
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Uss waqat VIKAAS ki car D.M house ke gate he par thi jab uske dash-board par rakha VIJAY ka mobile baj utha ! Udher , driving seat par baithey VIKAAS ne lohe wala vishaal gate khulwane ke liye horn bajaya idher, VIKAAS ke sath baithey VIJAY ne hath badhkar mobile uthaya ! Uski screen spark kar rahe no ko dekha !




Uss no ko woh pehchaan na saka ! Fir bhi on karke kaan se lagaya huya bola --" yes!"



" mujhe mister VIJAY se baat karni hai !" Dusri traf se ek mardaani awaaz ubhri !



" badhey khush naseeb hain aap Jo unhin se baat kar rahe hain !"



" oh ! mister VIJAY he bol rahe hain !" Kaha gaya --" mister VIJAY hum aap se milna chahtey hai !"




" par humein bhi tau patta lagey pyaarey ki humse Milne ki khwaish rakhne waley tum kaun ?"



" main Rajnagar ka he D.M bol raha hu Mister VIJAY ! Ajeet ! Ajeet naam hai mera !"



" oh !" VIJAY ko chownk Jana padda --" vaise tau hum hain he kuch itni pohnchi hui vastu ki log aksar humse Milne ke liye fadfaadatey rehtey hai ! Magar sawaal yeh hai -- tum kyun milna chahtey ho ?"




" woh sab main Milne par he bata paunga !"



"Kab milna chahogey ?"



" agar aap time dain tau abhi !"



Lohe waley gate ko khultey dekhkar VIJAY ne poocha --" kahan ?"



" jahan aap bulayein , main aane ko tyΰar hu !"



VIJAY ne kaha -- " yadi hum tumharey D.M house par aakar mil lain tau kaisa rahega ?"



" magar aap yahan kyun aayeingey ? Milna hum aapse chahtey hai jahan aap bulayein , hum aane ko tyΰar hai !"




" tum tau kewal aane ko tyΰar ho pyaarey magar hum pohanch chukey hai !"




"Kahan ?"



" tumharey reception par !"




" kya baat kar rahe hai aap ?" Dusri traf se haklahat si ubhri !



" hum jab baat kartey hai tau gadhey ki laat se bhi jiyada vajni hoti hai D.M pyaarey !" Kehne ke sath he VIJAY ne jaib se apna card nikaal kar receptionist ko dete huye phone par kaha --" hamara card tum tak pohanchne wala hai !"



" hadh kar rahe hain aap ? 'Aakhir - 'Aakhir aisa kaise ho sakta hai ki ..........!"





" hum tau Zinn hain pyaarey !" VIJAY bola -" yaad kro or hazir !"





Tabhi एक झटके से वह दरवाजा खुला जिस पर 'अजीत अवस्थी 'D.M ’ लिखा tha ।

वहीं मोबाइल जिसके जरिए वह विजय से बात का रहा या । चेहरे पर हेरत के असीमित भाव लिए वह सामने खडे विजय को देख रहा धा जबकि विजय के होंठों पर मुस्कान thi, वडी ही दिलचस्प मुस्कान वह अजीत अवस्थी की तरफ़ वढ़ता आ फोन पर वोला “मेरे ख्याल से अब हमें अपने मोबाइत्स ki battery का battha baithane की कोई जरुरत नहीं है !”

'आप ठीक कह rahe है” अजीत अवस्थी ने मोइल कान से हटाकर आँफ कस्ते हुए kaha-- "magar आश्चर्य की बात हे । मैंने आपसे मिलने का इरादा बनाया और aap यहीं आ गए "

“फोन पर ही बता चुके हैं प्यारे, विजय the ग्रेट कहते ही उस "जिन को हैं जो याद kiye जाते ही अपने आका के सामने हाजिर ho jata hai !" Kehta huya VIJAY Ajeet ke najdeek sir jhukata huya bola -- " hukam mere akkaa !"


Bhokhla sa gaya tha Ajeet !


Continue Hindi English mix chaleygi ?



______________________________
धब्बा ( सुरेन्द्र मोहन पाठक )
शिकारी दो तीन दिन बाद

Last edited by kirank1994 : 17th March 2016 at 06:22 PM.

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  #32  
Old 22nd February 2016
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बौखला सा गया अवस्थी !

काफी देर तक तो वह खुद को नियंत्रित ही न कर सका ।

नियंत्रित हुआ तो उन्हें अपने साथ आफिस में ले गया । वहाँ पहुंचकर भी chain नहीं mila उसे bola nahi nahi , यहा नहीं । हम drawing room मैं बैठकर आराम से बाते करेंगे aaiye !

"चाहे जहा बैठकर बाते कर तो प्यारे। चाहो तो खडे खडे भी बाते कर सकते ho । हमारी सेहत पर koi farak पडने वाला नहीं है ।" kehta हुआ विजय उसके पीछे वड gaya।

D.M office or रेजिडेशियल एरिया के मीच एक darwaza था उसे पार करके जव वे ड्राइंग room में पहुंचे तो अजीत अवस्थी ने thodi ऊंची आबाज में पुकारा 'निशा' !

एक अन्य दरवाजे पर पडा पर्दा हटाकर निश ड्राइंग room में आई ।

"ये मेरी पली है निशा अवस्थी ।" अजीत ने कहा "और निशा,

ये मिस्टर बिजय हैं । वही जिनका मैंने तुमसे जिक्र जिया था और से

मिस्टर विकास हैं ।"

जाने क्यों, उनका परिचय पाते ही निशा के चेहरे पर हवाइयां udne
लगी । कुछ देर तक वह उन्हें यू देखती रही जेसे किसी अज्ञात ताकत
ने नजरों को उनके चेहरों पर चिपका दिया हो फिर पलटकर अजीत

की तरफ देखती हुई बोली tau . .तो , aapne inhein yahan bula he liya ?"

"मैंने तुमसे कहा ही था।"

"स ..सोव लीजिए ।' विजय विकास ने महसूस किया, uski

आबाज काप रही थी "क्या उस सबसे कोई फायदा… ।' अपना सैटेस उसने खुद ही अपूरा छोड दिया या।

"Soch चुका hu।" अजीत ने कहा -- " humein beshak koi nuksaan hojaye , magar desh ka koi bohat badha nuksaan hone se Bach jayega !"



Kuch kehne ke liye nisha ne moonh khola magar uss se koi awaaz na nikal saki !





"Aapas mein he paheliyan bhujhatey rahogey D.M pyarey ya kuch kahogey bhi "





" pehle aap बताइए ।" अजीत ने कहा------"' हमसे kyun milna चाहते ये?"


"हम. .. । तुमसे किसने कहा हम तुमसे मिलना चाहते थे woh तो वस तुमने याद किया और " हम हाजिर हो गए है''

" aisa नहीं है मिस्टर विजय । कम से कम अब मैं समझ सकता हु-जव मैंने aap से मोबाइल /का सम्पर्क स्थापित किया तब आप डी. एम: हाउस में दाखिल हो gaye थे । जाहिर है aap मेरे फोन से पहले ही मुझसे मिलने aa रहे the । यहीं जानना चाहता हूं। aap मुझसे किसलिए मिलने आ रहे थे ।"


"अगर तुम पहले हमारी ही चोंच खुलवाने की जिद पर अड़े हो तो इस chhoti सी baat पर क्यो तुम्हें नाराज karey सो चोंच खोल रहे है।

विजय ने कहा -- "हम तुमसे हरशरण शास्वी के बारे में कुछ जानकारियां लेने के लिए मिलना चाहते थे ।"

"ह. . .हरशरण शास्वी के Baare mein ?"' अजीत, निशा एक साथ chownkey । .


"डी.एम. होने के नाते शायद यह बात tumharey संज्ञान में aa चुकी होगी कि विधायक ji खुदा को pyare हो gaye हैं ।"

"ज़. . .जी हां । म. . .मगर हमसे aap उसके बारे में क्या जानकारी लेना चाहते hai ?" " -


" rajnagar ke डी॰एम. की गदूदी पर तुम्हें उसी ने बैठाया था न?"

" .....अ आपको यह जानकारी किसने दी?"



"काले चोर का नाम सुना है कभी?"



"काला chor ?"



" aisi जानकारियां अक्सर kaaley चोर ही dete हैं और इस शहर के सारे काले चोर अपने याड्री हैं ।" .

“ज...जी… कुछ समझा नहीं। "



"जरूरत समझने की नहीँ है D.M प्यारे हमारे सवाल का ज़वाब देने की है ।" विजय अपनी सदाबहार टोन में कहता चला -

गया- "राजनगर के D॰एम की कुर्सी तुम्हें हरशरण शास्वी की कृपा

से ही मिली थी या नहीं?"



" haan ...."। अवस्थी की आंखें शून्य में स्थिर hogayi ----- " mili tau thi ।"

"उसके और तुम्हारे बीच क्या टाका भिड़ा था?"


" t....tanka ?"






"गुरु का मतलब है आपका उनसे क्या संबंध था?" विकास ने
पूछा ।



"कोई खास संबंध नहीं था । बस यही…यह सुनकर" उसके paas पहुच गए थे कि वर्तमान सरकार mein उसकी काफी चल रही है । वह जो काम चाहता है सरकार से करा लेता है ।"



"भैरवी देने की कोशिश मत करों प्यारे । डी.एम. की सी ऐसी नहीं होती जिस पर हरशरण शास्वी जैसे नेता किसी bagair खास जानं-पहचान के आई.ए॰एस. को बैठा दे । जामतीर पर यह कुर्सी नेता अपने खास ही चहेते को देता है ।"


"कह तो आप ठीक ही रहे हैं मिस्टर विजय ।"

"हम जब कहते हैं तो ठीक ही कहते हैं pyarey और इसी वेस पर पूछने aaye हैं-तुम हरशरण के खास क्यों थे? और जब khaas chahetey थे ही तो उसकी लाइफ़ के बोरे में भी कुछ खास जानकारियां रखते होंगे । हम यहां यह उमीद लेकर जाए हैं कि तुम उन खास जानकारियों पर अपने ज्ञान का प्रकाश डालोगे ताकि हमें उसकी हत्या के कारणों और हत्यारे को खोजने में सुविधा हो ।" "

"हरशरण शास्वी एक बहुत ही घटिया, नीच और कमीना आदमी tha ।” कहते-kehtey अजीत अवस्थी के चेहरे पर नफरत का सैलाब उमड padda -“ऐसे-ऐसे लोग पॉलिटिक्स में आ गए है कि भगवान ही जाने iss देश का क्या होगा !"

VIJAY or VIKAAS hairaan reh gaye!


विजय, ने तो कह भी दिया-"कमाल कर रहे हो प्यारे, जिसने तुम्हें डी एम की कुर्सी दी उसके बोरे में इतने उच्च विचार हैं तुम्हारे ।"

"ठीक ही कहा था आपने ।" janooni अवस्था में अवस्थी कहता चला गया-'"पोलिटीशियंस ऐसी kursiyan या तो चहेतों को देते है या भरपूर कीमत वसूल करते हैं । हम य ही सोचकर हरशरण शास्वी के पास पहुंचे थे कि वह जो भी कीमत मांगेगा हम देगे मगर..... Magar. ।" अजीत अवस्थी की जुबान लड़खड़ा गई ।


विजय ने बहुत dhyaan से उसके चेहरे पर "खदक्रत्ते लावे' को देखते हुए पूछा…- --" magar ?"



“उसने ऐसी कीमत mangi और हमे अपने जाल में फंसाकर वसूल भी की कि हमारा अस्तित्व bikhar कर रह गया ।"


“बात भेजे में घुसी नहीं pyarey , ऐसी यया कीमत वसूल की उसने?"





अजीत ने एक नजर निशा को देखा । निशा के चेहरे पर वेदना के अजीब से भाव ये ।

" aankhon ही-आंखों में उनके बीच कुछ बाते हुई और फिर अजीत अवस्थी सबकुछ बताता चला गया । सबकुछा ॰ जब वह यह बता रहा था कि हरशरण शाली ने किस षडूयंत्र के तहत उसे मजबूर करके निशा को हासिल karne ki koshish ki तब उसके चेहरे का तमाम लाबा विकास नाम के लड़के के चेहरे पर इकटूठा हो चुका था । अवस्थी अभी बोल ही रहा था जबकि विकास उसकी बात काटकर गुर्राता चला गया-"अगर सुभाष और bhgat सिंह के देश की बागडोर ऐसे ही पोलिटीशियंस के हाथों में aa chuki चुकी है तो. . जो अब इस देश को बचाने का केवल एक ही रास्ता chun चुन कर हरशरण शास्वी jaise लोगों को गोली से उड़ा दिया जाए और…ओर मैं तो कहता दूं…-जिंदा तुम जैसे बुजदिल लोगों को भी नहीं छोड़ना चाहिए मिस्टर

अवस्थी । जो लोग ऐसी कीमत पर पद हासिल करते हैं उन्हें चुल्लू भर
पानी में डूबकर मर जाना चाहिए । अरे तुम्हें तो उसी pal Harsharan शारत्री की लाश बिछा देनी चाहिए थी ।"



" जी तो यही चाहा था मिस्टर विकास ।" अजीत के दांत र्मिचत्ते चले गए-…""जुनून बनकर जेहन में तूफान तो कुछ ऐसा ही उठा था मगर. . ॰मगर उसने ठीक ही कहा था उस वक्त । अगर मैं उसकी बात न मानता तो जेल चला जाता । मेरे जेल जाने का मतलब था-निशा का असहाय रह जाना । असहाय निशा किसीभी तरह खुद को उस राक्षस से नहीं बचा सकती थी ।"


"इसलिए तुमने अपनी पत्नी को उसके हवाले कर दिया.. .wah.. बहुत खूब ।" '

" taanki baad mein उसे उसकी करतूत का मजा चखा सकू ।"

"क्या मतलब?"

"उसे मैंने ही मारा है ।"

"त. . tumne ?!"' विकास के साथ विजय भी चीक पड़ा ।

फिर विकास ने कहा- " theek किया है यही करना चाहिए tha तुम्हें ।

ऐसे लोगों की यहीं एकमात्र सजा है । मगर लेट किया । tum इतने लेट क्यो हैं मिस्टर अवस्थी? क्यों नहीं तुमने उसे उसके irade jaankar ussi din ludka diya hota tau nisha ke Marne tak ki nobat na aayi hoti !"

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धब्बा ( सुरेन्द्र मोहन पाठक )
शिकारी दो तीन दिन बाद

Last edited by kirank1994 : 18th March 2016 at 04:08 PM.

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  #33  
Old 22nd February 2016
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"बता चुका हूं । उस वक्त सारे हालात उसकी मुट्ठी में थे । चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता था मैं । उल्टा जेल चला जाता । डरा मैं जेल जाने से नहीं था । डरा था -- अपने बाद निशा के असहाय रह जाने से । जेल जाने से डरा होता तो इस वक्त आपको यह सब न बता . रहा होता? जानता ही हूं ........ जेल तो अब जाना ही होगा मुझे ।"


"नहीं । तुम्हें कोई जेल नहीं भेज सकता ।" विकास ने विजय की त्तरफ देखते हुए दृढ़तपूकि कहा----" मै खड़ा हूँ तुम्हारे साथ ।" "

ज़वाब में कुछ नहीं बोला ।

इसलिए अजीब-सा संनाटा छा गया । उत्तेजना से भरपूर अजीब-सा तनावपूर्ण सन्नाटा ।

"प्यारे अजीत ।" विजय की आवाज पर वहाँ के उत्तेजनात्मक माहोल का कोई असर नहीं था…


"बात मधुमक्खी की तरह भिन-भिनाती हुई मेरी खोपडी के चारों तरफ़ घूम रही है । मगर भेजे में नहीं उतर पा रही । अगर तुम्हें जेल जाने का डर नृही था तो सरेआम सबके समाने शास़त्री को गोली से क्यों नहीं उड़ा दिया? क्यों तुमने उसकी हत्या इस तरह की कि वह एक्सीडेंट नजर आए? इससे तो जाहिर होता है कि तुम उसकी हत्या के इल़जाम में फंसने से बचना चाहते थे ।"


"ठीक कहा आपने । सोचा मैंने यही था कि उसे खतम भी कर दू और बचा भी रहू । एक आम हत्यारे की तरह कोशिश मेरी यही थी मगर यहां आनेे के बाद निशा से बात करने के बाद मेरे विचार बदल गए ।"

"कारण?



"मैंने शुरू से उसकी गाडी को हिट करके हत्या का प्लान बनाया था ताकि लोग उसे एक्सीडेंट समझे । इसी ताक में मैं अपनी गाडी सहित उसके पीछे लगा हुआ था । पीछा करता-करता उस सडक पर पहुंचा जिसके साध बहती नदी से आप लोगों को उसकी गाडी मिली । पीछा करने के दरम्यान मैंने देखा था ---एक क्वालिस से तीन-चार गुंडों ने एक जख्मी व्यक्ति को उंसकी एस्टीम में ट्रांसफ़र किया । उस ववत उनसे काफी दूर होने के कारण मैं जखमी व्यक्ति का चेहरा नहीं देख पाया था। केवल इतना ही देख सका-क्यालिस उस व्यक्ति क्रो एस्टीम में ट्रांसफर करके शहर की तरफ लोट आई जबकि एस्टीम पाकिस्तानी बॉंडर की तरफ बढी । मुझे शास्त्री से. मतलब था, इसलिए , एस्टीम के पीछे लगा ।





बार्डर से पहले बैरियर पर तैनात पुलिस वालों

ने उसे रोका जरूर मगर जाने उसने उनसे क़या बाते की, पुलिस वालों

ने एस्टीम की तलाशी लिए बगेर चले जाने दिया । मैं भी पुलिस वालों को अपना परिचय देने के बाद बैरियर क्रॉस कर गया । वह एस्टीम

सहित सीधा बार्डर पर पहुचा । वह ऐसी जगह धी जहां आर्मी का कोई जवान तैनात नहीं था । यहाँ पाकिस्तान की तरफ से आई हुई एक गाड़ी पहले से खडी थी । जख्मी व्यक्ति को एस्टीम से उस गाड्री में ट्रांसफर किया गया । वह गाडी पाकिस्तान की तरफ चली गई । एस्टीम वापस लौटी । मैं इससे ज्यादा कुछ नहीं समझ सका कि किसी जख्मी व्यक्ति को पाकिस्तान पहुंचाया गया है । समझने की कोई खास कोशिश भी नहीं की क्योंकि दिमाग केवल और केवल अपने लक्ष्य में उलझा हुआ था । लक्ष्य था--शास्वी का खात्मा और....... मेरे हिसाब से मोका सुनहरा था अत: पुलिस बैरियर पार करने के कुछ देर बाद ही मैंने उसकी एस्टीम को हिट किया । वह नदी में जा गिरी । अपना काम करके मैं आराम से यहां आ गया । सब कुछ निशा को बताया ।"

"सुनकर वैसा ही सुकून मिला मुझे जैसा कि किसी भी को अपने बच्चे के हत्यारे की लाश क्रो देखकर मिलता होगा ।" बहुत देर से खामोश खड्री निशा कहती चली गई -----" गर्व हुआ यह सोचकर कि मैं एक ऐसे पति की पली थी जिसने पूरे हौंसले के साथ अपनी पत्नी के इज्जत पर हाथ डालने वाले का खात्मा किया, जब मुझे उस के डिनर पर आने का पता चला , मेरी आंख फड़फड़ाने लगी , इन से जबरदसती नकली खून की वोतलें मंगवा ली , और समय रहते मैं वच गई , वरना जाने कया हो जाता ।"



"यहां आने के बाद मुझे पता लगा…एक क्वालिस मे सवार कुछ लोगों ने मोहम्मद इकराम साहब को किडनैप कर लिया है ।" अजीत कहता चला गया…"एक ही झटके में सारी बात मेरी समझ में आती चली गई । हरशरण जलील और कमीना ही नहीं, देशद्रोही भी था । उसने इकराम साहब जैसे नेक नेता को पाकिस्तान पहुंचा दिया था । यकीनन वह सब किसी बड़े षडूयंव्र के तहत हुआ है । किसी ऐसे उददेश्य के साथ जिससे हमारे देश का कोई बहुत वड़ा अहित होने वाला है । उस वक्त मुझे अफसोस हुआ -- मैं क्यों उस व्यकित को न पहचान सका । यदि पहचान लेता मैं इकराम साहब को पाकिस्तान नहीं पहुंचने दे सकता था । चाहे जो होता- उसी जगह शास्वी को खत्म कर डालता और इकराम साहब को बापस ले आता

मगर अब पछताने से क्या होने वाला था?





तब मैने फैसला किया -- हरशरण की हत्या के इल्जाम में फंसता हूँ तो फंसता रहू मगर इस खबर को सही शख्स तक जरूर पहु'चाऊंगा क्रि इकराम साहब को पाकिस्तान पहुचा दिया गया है । निशा ने कोई विरोध नहीं किया । केवल इतना ही कहा------"' आप देश के लिए जेल जाने को तेयार हैं तो मैं भी सदियों "तक आपके जेल से बाहर जाने का इंतजार करू'गी ।'

तब, मैंने आपको सब कुछ बताने का फैसला किया, इसलिए फोन किया था । सब कुछ आपको बता दिया है । मुझे जेल जाना है तो भले ही चला जाऊं मगर उम्मीद है - यह सब आपकी नॉलिज में आ जाने के बाद इस देश के खिलाफ पाकिस्तान द्वारा रचा गया कोई षडूयंत्र . कामयाब नहीं होगा ।" ' अजीत अवस्थी की बात पूरी होने के बाद ड्राइंग रूम में एक बार फिर सन्नाटा पसर गया । यह सन्नाटा पिछले सन्नाटे की तरह तनावपूर्ण नहीं था बल्कि इस सन्नाटे में अजीब-सी शति थी ।

विजय-ने एक नजर विकास की तरफ देखा ।

फिर, अजीत अवस्थी के कंधे पर हाथ रखकर बोला…“इस बात को हमेशा-हमेशा के लिए मूल जाओ मिस्टर अवस्थी कि हरशरण शास्वी की एस्टीम को तुमने हिट किया था । ऐसे देशभक्त लोग देश मे कम बचे हैं जो अपनी जान तक को दांव पर लगाकर देश का भला चाहते हो और मैं देश के ऐसे ही एक और बेटे को नहीं छीन सकता । जो कुछ हमें बताया. . .भूल कर भी वह कभी किसी और को मत बताना ।" कहने के बाद विजय मुडा और तेज़ कदमों के साथ दरवाजे की तरफ बढ़ गया ।

उसके चंद शब्दों का अर्थ समझते ही निशा उसके पीछे लपफी । दोड़ कर उसके कदमों में गिर गई । बुरी तरह फूट- फूटकर रो पड़ी थी वो ।

बोली-की " आप महान हैं विजय भैया! आप महान है ।"


विजय ने उसके दोनों कंधे पकड़े । उठाकर अपने सामने खडा करते हुए बोला---" मै तो जोकर हूँ निशा बहन । हमेशा जोकर ही रहूंगा 1 महान तो ये है----- " ये साला दिलजला । मैंने इसकी आंखों में देख लिया था कि यह क्या चाहता है । वही किया है । उससे ज्यादा कुछ भी न "

विकास का ,दिल आज पहली बार चाहा-अपने गुरु विजय को वह चूमता'

चला जाए ।
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Last edited by kirank1994 : 19th March 2016 at 01:36 AM.

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एक ताले में चाबी घूमने की आवाज उभरी ।

हैरी सतर्क हो गया ।


वह समझ गया -- उसे डिनर पहुंचाने बाले आ पहुंचे हैं ।

इस वक्त वह एक छोटी - सी सीलनभरी कोठरी में था । उस कोठरी में एक मात्र दरवाजा था । लोहे का भारी- भरकम दरवाजा ।



' कुछ वैसा- जैसा' सर्राफ की तिजोरी का होता है ।



दरवाजे के ठीक सामर्ने' वाली दीवार में एक रोशनदान था । फर्श से करीब आठ फुट ऊपर । यह केवल एक फुट बाई एक पुट का था ।


मोटी-मोटी सलाखों से युक्त मगर, हैरी उन सलाखों को एक सिरे से .......उखाड़कर मोड़ चुका था । यह काम उसने आज लंच के बाद किया था ।



कोशिश तो उसकी सलाखों को पूरी तरह उखाड़कर रोशनदान के दुसरी तरफ फेक देने की थी, परंतु कोशिश के बावजूद कामयाब न हो सका ।


फिर, जितना हुआ था-उसी से संतुष्ट हो गया ।



कारण वह जानता था , उसका काम इतने ही है चल जाएगा ।


और ।



जो उसे करना था, ताले में चाबी के घमने की आवाज सुनते ही शुरू कर दिया ।


किया उसने ये कि दोनों हाथ बंद दरवाजे की दाईं चौखट पर जमाए, दोनों पैर बाई चौखट पर औंर ॰जबरदस्त फुर्ती के साथ उसी पोजीशन में ऊपर उठता चला गया ।



"भारी-भरकम दरवाजा खुलने तक हैरी दरवाजे के ठीक ऊपर लेंटर के नजदीक था ।


वे दो थे ।


जिस्यों पर पाकिस्तानी आमीं का लिबास ।


हमेशा की तरह एक के हाथ में खाने की थाली थी , दूसरे के हाथ में ए के सैंतालीस ।

दरवाजा खोलकर उन्होंने कोठरी में काम रखा ।

वहाँ पूर्ववत् जीरो वाट के बल्ब की रोशनी बिखरी पडी थी ।

कैदी को नदारद पाकर वे दोनों चौंके ।
एक के मुंह से निकला --- " अरे कहाँ गया हैरी ?"


" वो ....... वो देख !" दुसरे ने रोशनदान की तरफ इशारा किया !



पहले के मुंह से निकला --" हाय अल़्लाह ! शायद भाग गया !"



"गधा है तू । दूसरा बोला-"" भला इतने छोटे रोशनदान से कोई कैसे पार हो सकता है ?"



"फिर वह कहां गया और. . .सलाखें क्यों मुडी हैं?"




इस सवाल का जवाब दुसरे के पास भी नहीं था । उन्हें इसी उलझन में फंसाने के लिए… तो हैरी ने सलाखें उखाडी थी । वह जानता था काफी देर तक है उसी उलझन के शिकार रहेगे कि उस रोशनदान के माध्यम से ही हैरी बाहर निकला तो कैसे निकला ।





2

उन्हीं पलौं का लाभ उठाने की ठानी थी उसने ।

उसने, जो इस वक्त अपनी प्लानिंग के मुताबिक दोनों पाकिस्तानी सैनिकों के ठीक सिर के ऊपर था ।



इसी कारण वे उसे देख नहीं पा रहे थे ।


अब ज्यादा देर करना हैरी ने मुनासिब नहीं समझा।

वे दोनो अमी उलझन से निकलने की कोशिश कर ही रहे थे कि…- हैरी दोनों पर एक साथ आ टपका।



थाली वाले की गर्दन उसकी टांगों की केचीं में जा कसी थी । तो गन वाले की ठीक गन पर जा जमे थे हैरी के दोनों हाथ ।


दोनों पर जैसे गाज गिरी पडी थी ।


थाली हाथ से छुटी, खाना कोठरी के फर्श पर बिखर गया ।


गन हैरी के हाथों में पहुच चुनी थी ।


और.. हैरी के हाथों में अगर गन थी तो गजब तो होना ही था ।


एक की गर्दन में केचीं फंसाए उसने दुसरे को 'धार' पर लिया, ट्रिगर पर जीती का दबाव बड़ाता चला गया । 'रेट-रेट-रेट ।'


गन गर्जना दूर-दूर तक छाए सन्नाटे का कलेजा चाक-चाक कर गई !


फिर‘ बेचारे थार पर अाए क्लेजे की कौन कहे ।


केवल पलक ही झपकी थी कि अपने ही लहू से नहा गया वह ।


चीखने तक का मीका नहीं मिला…।


ए के सैंतालीस से खौफ खाई उसकी आत्मा ने जिस्म छोडा और ........

सिर पर पेर रखकर ईश्वरपुरी की तरफ दौड लगा ही । खून में नहाया जिस्म वहीँ पडा रह गया ।


दूसरी तरफ़ था यह, जो टांगों की कैची में फंसा था ।

आजाद होने के लिए छटपटा रहा था वह ।



' हैरी ने ऐसी अंगड़ाइं ती जैसे अजगर ने करवट बदली हो ।

सेनिक का सिर फ़र्श से जाकर टकराया । केचीं के निकलते ही वह मुंह से चीखे निकालता हुआ कोठरी की एक दीवार की तरफ लुड़कता चला गया ।


हैरी ने रबड़ के बबुवे के तरह उछलकर खुद को सीधा खड़ा किया ।


उधर, सेनिक भी संभलकर उठने की कोशिश का रहा था ।

हेरी चाहता तो उससे थोड्री देर खिलवाड़ कर सकता थी मगर नहीं, उसे लगा… -उसके पास खेलने का वक्त नहीं है ।







3

सो, गन सीधी की !


ट्रिगर पर ऊंगली देखते ही वह एक वार फिर हकलाई ।



पलक झपकते ही दूसरे सैनिक का जिस्म भी मलवे में तब्दील हो गया !!



उसी समय कोई जोर से चीखा था.....…“होशियार कैदी फरार होने की कोशिश कर रहा है ।"



गन संभाल हैरी दरवाजे पर झपटा ।



दाई तरफ से भागते कदर्मों की आवाज उभरी थी । लड़के ने वगैर सोचे-समझे गन की नाल आवाज की दिशा में घुमाई और मुंह खोल दिया ।


वह इंसानी चीख, जो वास्तव में काफी जोरदार थी , गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच दबकर रह गई ।



अब हैरी का कोई शिकार उसके सामने नहीं था ।

सामने थी तो केवल दोनों तरफ फैली गैलरी । पन्द्रह फुट चौडी थी वह । छत पर जागह-जागह बल्ब लगे थे । एक क्षण केवल एक क्षण हैरी ने यह सोचने में गंवाया कि उसे दाई तरफ बढना चाहिए या वर्ष तरफ, उसी एक क्षण में वहां अलार्म की कर्कश आवाज गूंज उठी । हैरी को नहीं मालूम था कौन - सा रास्ता उसे इमारत के और अंदर ले जाएगा, कौन सा बाहर । फिर भी, वह उस तरफ दौड पड़ा जिस तरफ़ उसके हाथ में दबी गन का तीसरा शिकार पड़ा था । उसकी लाश को एक ही जम्प में पार करता हुआ हैरी आंधी-तूफान की तरह गेतरी के मोड की तरफ दोड़ा ।-मोड़ पर पहुंचते-पहुचते उसने मोड के पार के से सेनिक बूटों क्री आवाजे सुनीं । हैरी हालांकि उन बूटों के मालिकों को देख नहीं सकता था मगर समझ सकता था कि ढेर सारे सेनिक दौड़ते हुए इसी तरफ आ रहैं हैं ।।।।


उसने खुद को गेलरी के कोने की दीवार के साथ सटा लिया ।


उसने खुद को गेलरी के कोने की दीवार के साथ सटा लिया ।



करीब दस सेनिक मोड़ क्रॉस करके उसके सामने आए । किसी को यह देखने का होश नहीं था कि जिसकी वजह से अलार्म चीखे जा रहा है वह दीवार के सहारे खड़ा है । सभी उस दिशा में भागते चले जा रहे थे जिधर हैरी की गन का तीसरा शिकार पड़ा था । उन सभी की पीठ इस वक्त हैरी की आंखों के सामने थी । इसके बावजूद उसने गन का मुह खोलने की कोई जरूरत नहीं समझे । उन्हें अपने साथी की लाश की तरफ दौडने दिया । खुद ने भीड के दुसरी तरफ देखा !! उधर , जिधर से दौडते हुए वे आए थे ।





गेलरी के उस हिस्से में इस वक्त कोई नहीं था ।



सो-----" ने खुद को मोड़ के उस तरफ किया ।


अब 'उसका जिस्म मोड़ के इस तरफ था और, गन की नाल तनी थी ? - दस सैनिकों की टुकडी की तरफ ।



उस दुकड्री की तरफ, जो हैरी की गन के तीसरे शिकार की लाश के नज़दीक पहुचकर ठिठक चुकी थी ।



कुछ देर के लिए सब यूं खड़े रह गए थे जैसे लकवा मार गया हो !


- फिर, एक के होंठ हिले--' इसे उसी ने मारा होगा?'


"और क्या हमारा ही कोई साथी अपने सायी को मारेगा बेवकूफ?” एक जन्य झुंझलाया ।


"मगर ।" तीसरा बोता---- “इसे मारकर वह यहां से गया किधर?"


"पीछे से तो हम आ ही रहे हैं । जरूर सामने की तरफ गया होया ।"


''उसे पकड़ो बेवकूफो । अगर वह निकल गया तो हम् लोगों की खेर नहीं ।"



"लेकिन सर, अगर वह सामने की तरफ़ गया है तो बाहर कैसे निकल जाएगा । उधर से तो बाहर निकलने का रास्ता, ही नहीं है ।" एक सेनिक ने अपनी बुद्धिमत्ता झाड़ी ।।।




उसकी बु्द्धिमत्ता ने हैरी को बता दिया यह सही रास्ते पर है । अब उनके बीच होने वाली आगे की वार्ता सुनने की कोई कोशिश नहीं की बल्कि गन संभाले उस तरफ़ लपका जिधर से वह सेनिक टुकडी आई… थी । वह दो बाते जान चुका था । पहली-टुकडी इसं तरफ नहीं आएगी बल्कि उस इमारत के अंदर की तरफ जाकर उसी तरफ बाढ़ेगी !!! दूसरी-जिस रास्ते पर बढ़ रहा है, वह उसे इमारत से बाहर ले जाएगा और फिलहाल उसका पहला लक्ष्य यही था ।


सो वह तेजी के साथ रास्ता पार करने लगा ।


कई मोड़ पार करने के बाद एक दरवाजा नजर आया । दरवाजा

लोहे का वना था और उतना ही मजबूत था जितना उस कोठरी का था

जिसमें उसे कैद किया गया था । दोनों दरवाजों में फर्क था तो केवल

यह कि इस दरवाजे में ऊपर की तरफ सांलेड लोहे की जगह छ: इंच चौड़े एरिया में सलाखें लगी थी । सलाखों-के पार उसे तीव्र प्रकाश नजर आया अर्थात दरवाजे के उसे तरफ गैलरी के मुकाबले ज्यादा रोशनी थी । सलाखों के कारण उस तरफ से इस तरफ और इस तरफ से उस तरफ देखा भी जा सकता था !!!!




खुद को दिवार से चिपकाए उसने दबे पांव दरवाजे की तरफ़ बढना शुरू किया ।

अभी काकी इधर था कि सलाखों के उस पार एक चेहरा नजर जाया । धनी काली दाढी वाला । क्रूर-सा चेहरा । उसकी भर्वो पर भी _ काफी ज्यादा बात थे । अपनी गडूढे में धंसी-सी आंखों से वह सलाखों के इस तरफ़ देखने की कोशिश कर रहा था और. . हैरी ने अगर खुद को दीवार के साथ चिपकाकर आगे बढने की सतर्कता न बरती होती तो इस पत्ल निश्चित रूप से दाढी वाले द्वारा र्देख लिया जाता ।

हैरी ठिठक गया । सांस तक रोक ती उसने ।

गन की नाल धीरे-धीरे दरवाजे के 'जंगले' की तरफ उठानी शुरू - कर दी थी ताकि दाढी वाले के द्वारा देखा जाते ही उसे शहीद कर दे । हैरी केवल दीवार से चिपका हुआ था । ऐसी किसी आड में नहीं था जहाँ दाढी वाले द्वारा देखा न जा सकता ।

मुकम्मल गैलरी में घूम रही उसकी आंखें हैरी की तरफ घूमने ही वाली थी ! कि...........

दरवाजे के उस पार से 'पिंग-पिंग' की आवाज उभरी ।

हैरी समझ गया-वह किसी ट्रांसमीटर की आवाज़ है । -

सलाखों से उस पार अब दाढी वाले के सिर का र्पिछला हिस्सा नजर आ रहा था ।


जाहिर है, वह आवाज की दिशा में पलट चुका था ।

हैरी की रुकी हुई सांसें मानो पुना चलनी शुरू हुई ।

"पिंग-पिंग' की जायज वातावरण में लगातार गूंज रही थी ।

फिर, दाढी वाले के सिर का पिछला हिस्सा भी नजर आना बंद हो गया । हैरी समझ सकता था------: लगातार सिग्नल दे रहा है, ट्रांसमीटर की तरफ लपका है ।

उस तरफ का हाल जानने के लिए हैरी तेजी से दवे पाव दरवाजे

की तरफ लपका ।

सावधानी के साथ चेहरा सलाखों की उग्वांई तक ले गया ।

उसने देखा-दरवाजे के उस पार काफी लंबा-चोड़ा हाँल था । हाल में मौजूद इलेक़़टृानिक मशीने बता रही थी वह कंट्रोल रूम है । दाढी वाले ने एक शक्तिशाली ष्ट्रसिंमीटर के नज़दीक पहुंचकर उसे आँन किया । दूसरी तरफ से उभरने वाली आवाज साफ--. 'हैरी' क कानों तक पहुंची…“कैप्टनं इरशाद, क्या यहाँ कोई गड़बड़ है? हेडक्वार्टर के अदर से फायरिंग की आवाज सुनी है ।"




'मुझें लगता है सर, कैदी कोठरी से बाहर आ गया है दाढ़ी वाले ने कहा, जिसका नाम यकीनन इरशाद था ।


: "क्या बकवास कर रहे हो?" दूसरी तरफ से डांटा गया-“केसे . हो गया ऐसा?"



"मेरे ख्याल से ज्यादा फिक्र की बात ही नहीं है सरा"



"फिक्र की बात की नहीं है? . . वह कोठरी से बाहर आ गया ओंर तुम कहते हो फिक्र की बात ही नहीं है । इसी ज्यादा फिक्र की और क्या बात होगी ?''




कैप्टन इरशाद ने हकलाते से अंदाज में कहा ----"'मैंने केवल आशंका जाहिर की है सर । पक्के तौर पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता । मेरी ऐसी धारणा-गन की आवाज़ सुनकर बनी है जबकि ये - भी मुमकिन है कि गन हमारे ही किसी सेनिक ने चलाई हो ।"



“बेवकूफी जैसी बात मत करो कैप्टन ।" ट्रांसमीटर के दूसरी तरफ़ मौजूद शख्स के मुंह से गुर्राहट सी निकली - "हमारे ही सेनिक भला एक-दूसरे पर गोली क्यों चलाएंगे । जरूर कोई गडबड है ।”



“वही तो कह रहा दूं सर । गड़बड़ मुझे भी . लग रही है । इसलिए सूबेदार हैदर अली को उसकी टुकडी के साथ सुरंग में 'मेजा है । सुरंग और कंट्रोल रूम के बीच का दरवाजा मैंने बंद कर लिया है '।"

"इससे कया होगा?" '

"पहली बात…-अगर वह कोठरी से बाहर आ भी गया तो हैदर'अली की टुकडी उसे काबू में कर लेगी । दूसरी बात -सुरंर्गों के जाल से बाहर निकलने का केवल एक ही रास्ता है, वह जिसे मैं बंद कर चुका हूं !!!

आप जानते हैँ…इस दरवाजे को या तो मैं कंट्रोल रूम की तरफ से खोल सकता हू या सुरंग की तरफ़ से केवल हैदरअती । अर्थात् अगर वह कोठरी से बाहर आ भी गया तो सुरगों के जाल को भूलकर कंट्रोल रूम तक नहीं पहुच सकेगा । मेरा दावा है…हैदरअली - उसे वापस कोठरी में बंद करके ही लौटेगा ।"



"सवाल ये है, वह कोठरी से बाहर अाया कैसे?"


"कुछ ही देर पहले------" हमेशा की तरह दो सेनिक उसके लिये रात का खाना लेकर गए थे । वह किसी तरह उसे चकमा देकर बाहर आने

में कायमाब हो गया होगा । ऐसा केवल मेरा ख्याल है सर । सही रिपोर्ट तो हैंदर'अली के लौटने पर ही मिलेगी ।"


78



"कैप्टन इरशाद, क्या तुम उस कैदी के र्फरार होने का मतलब समझते हो?”



"हां सर अच्छी तरह समझता हूं।”


"क्या समझते हो."'



“वह हमारी यानी पाकिस्तानी आमीँ का नहीं, पाक सीकृेट सर्विस का कैदी है । पाकिस्तान की शान कहे जाने वाले जासूस नुसरत-तुगलक का कैदी है । उसे वे सीधे न्यूयार्क से पकड़ कर लाए थे... ।"



"और अगर वह फरार हो गया तो हमारा कोर्ट मार्शल सीधे जनरल द्वारा किया जाएगा ।” दूसरी तरफ से बात पूरी की गई ------" मुमकिन है सीधे -- सीघे नुसरत तुगलक के हवाले कर दिए जाएं । सुना है वहुत जालिम हैं वे । एक बार अगर किसी को टॉर्चर करने परं जामादा हो जाएं तो. . . ।" '

"मेरी समझ में नहीं जा रहा सर, वह कभी फरार नहीं हो सकता । आप बेवजह फिक्रमंद हो रहे हैं ।"



"नुसरत-तुगलक ने कहा था वह बेहद खतरनाक है ।"


"खतरनाक भले ही चाहे जितना हो पर है तो आदमी ही सर, भूत तो नहीं है जो हम सबको नजर आए बगैर फरार हो जाएगा !!"




"ज्यादा बड़ी-बड़ी बाते मत करों । हमें जल्द -से-जल्द यह खबर चाहिए फि उसे वापस उसकी कोठरी में बंद कर दिया गया है ।"



"यकीनन वहुत जल्द आपको यह खबर मिलेगी ।" कहने के साथ . कैप्टन इरशाद ने ट्रांसमीटर का स्विच आँफ कर दिया ।

'हेरी' का दिमाग बहुत तेजी से काम कर रहा था । बहुत-सी बाते वह पहले से जानता था मगर कुछ बाते अभी- अभी पता लगी थी !




उनमें सबसे अहम बात थी--------, दरवाजे को या तो कैप्टन इरशाद खोल सकता है या हैदर अली ।



इसके खुले बगैर वह सुरंगों के जाल से बाहर नहीं निकल सकता था ।



ट्रांसमीटर आँफ करते ही इरशाद दरवाजे की तरफ घूमा । पलक झपकने जितने समय में यदि हैरी ने खुद को नीचे न बैठा लिया होता तो नििश्चत रूप से उसके द्वारा देख लिया जाता । वह समझ सकता था -एक बार फिर इरशाद इसी दरवाजे की तरफ़" बढेगा । सलाखों के उस पार से गेलरी पर नजर रखने के अलावा फिलहाल उसके पास काम भी यया था? "

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हैरी के पास इतना समय नहीं था कि वह इरशाद के जंगले पर आने से पहले गेलरी के पहले गोड़ को पार करके दूसरी तरफ पहुंच सकता । मोड़ काफी दूर था और ऐसा प्रयास करते वक्त वह इरशाद द्वारा देख लिया जा सकता था गो, खामोशी के साथ लोहे के किवाड़ से चिपका बैठा रहा!!!!



सांसें तक रोकली थीं उसने।


दूसरो तरफ से पदचाप उभरी । भारी मिलिट्री बूट की पदचाप ।


आवाज निरंतर नजदीक अता रही थी ।


जाहिर है-इरशाद दरवाजे की तरफ़ बढ़ रहा था !



फिर, पदचाप दरवाजे के दूसरी तरफ बेहद नज़दीक जाकर स्क गई !!



हैरी समझ गया…इस बक्त वह सलाखों के उस पार से गैलरी में खाक रहा होगा ।


इस एहसास ने 'हेरी' को बेहद रोमांचित कर दिया कि दुश्मन उसके वेहद नजदीक है । केवल उतना दुर जितनी लोहे की चादर की , मोटाई है ।


अपने दिल की धक-धक अब वह साफ सुन सकता था ।



दिमाग मैं सवाल कौंथा-वया करूं?


वर्तमान हालात में क्या करना मुनासिब होगा?


उसी समय, वातावरण में एक लाइटर 'आँन' होने की आवस्था उभरी ।


फिर आफ , होने की आवाज ।





और उसके बाद…गाढ़ा घुआं सलाखों के बीच से गेलरी की तरफ आया ।


हैरी के सिर पर मंडराया । जाहिर है-इरशाद सिगार, सिगरेट या बीडी का मजा ले रहा था ।



हैरी उसकी मानसिक अवस्था पकड गया । समझ गया किं अब - वह तब तक जंगले से नहीं हटेगा जब तक सेनिक टुकडी को वापस . आता न देख लें । उसके वहां से न हटने का मतलब था… हैरी भी अपने स्थान से नहीं हट सकता था । उसे बेचैनी- सी होने लगी ।


बेचैनी का कारण था-दुकड़ी वापस आ गई तो वह द्रोनों तरफ़ से धिर जाएगा । ' वे हालात उसके फेवर में नहीं होंगे ।
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______________________________
धब्बा ( सुरेन्द्र मोहन पाठक )
शिकारी दो तीन दिन बाद

Last edited by kirank1994 : 20th March 2016 at 06:58 AM. Reason: 7 updates added

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  #35  
Old 22nd February 2016
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GUDIYA
 
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सो, उसने फैसला किया ।

भयानक फैसला ।

फैसला करते ही एक झटके से खड़ा हो गया वह ।

उधर, इरशाद दुश्मन को अचानक इतना नजदीक पाकर हौखला उठा । बल्कि अगर यह कहा जाए तो ज्यादा मुनासिब होगा, ठीक से बौखला तक नहीं पाया बेचारा । उससे पहले ही हैरी के हाथ में दबी गन की नाल उससे रू-ब-रू हुई और दमे के मरीज की तरफ़ खांसने लगी ।

इरशाद का चेहरा पचासवीं मंजिल से गिरा दरवाजा बन गया ।

हैरी ने दरवाजे के उस तरफ पडी इरशाद की लाश को देखने में केवल एक पल गवाया था । अगले पल गन संभाले गेलरी में वापस दैड़ पड़ा ।


लक्ष्य था…गेलरी का पहला मोड ।

यहीं पहुंचने से अव उसे रोकने वाला था भी कौन?

वही हुआ जिसका अनुमान हैरी पहले ही लगा चुका था…मोड़ पर पहुचते ही उसने गेलरी के दुसरी तरफ से भागते कदमों की आवाज सुनी !


नजदीक आती आवाजे !

जाहिर था-वे सब गन के "खासने' की आवाज सुनकर दौडे चले जा रहे थे ।


हैरी ने पहले गन की नाल मौड़ के उस तरफ़ घुमाई । फिर, चेहरे का आंखों से ऊपर तक का हिस्सा बाहर निकालकर
गर्जा-‘" खबरदार: एक कदम भी अागे कीया तो भूनकर रख दूंगा ।"


सारी दुकडी़ इस तरह ठिठक गई जैसे एक ही रिमोट से कंट्रोल हो रही थी !!!


उन में से किसी को भी सोचने का मौका दिये बगैर हैरी गुराॉया -- " तुम में से हैदर अली कौन है ?"


सन्नाटा !!!!



हैरी उनको सोचने --समझने के लिये १ पल भी देने के मूड़ मे नहीं था अतः मुहं से कड़क आवाज निकाल कर वोला ---- "जल्दी वोलो वरना उस के चक्कर मे सब मरोगे !




सबकी नजर एक फै्रनच कट दाढ़ी वाले शख्स की तरफ उठी !!




हैरी के लिए इतना काफी था ।

इस बार हरकत हैरी' के होंठों ने नहीं, उंगली ने की ।

" बगैर समय गंवाए अपनी गन का मुहं खोल दिया उसने । "

मगर ।

एक भी गोली हैदरअली को छू ऩा सकी !



हां उसके चारों तरफ मोत का तांडव जरूर हुआ था ।


खड़ा-खड़ा थर्रा रहा था वह । जब होश में आया तो अपने चारों तरफ अपने साथियों की लाशे पडी पाईं । खून के तालाब में डूबी लाशें ।



अभी वह इस हकीकत को समझ ही पाया -था कि वह. कैवल वहीं-जिदां है कि हैरी जिन्न की तरह मोड़ के पीछे… से प्रकट होकर उसके सामने आ खडा हुआ । .

उसकी गन की नाल अभी तक घूम्रपांन करती नजर आरही थी ।



हैदरअली को यह मौत का शेतान-सा नज़र साया ।


पलक झपकते ही जो कुछ हो गया था, क्रइं पल तक तो खुद को उसी के सदमे से बाहर नहीं निकाल पाया । सदमे से बाहर निकलते ही दिमाग में पहला ख्याल' कौंधा'-…"दुश्मन सामने खड़ा है । वह, जो अगले पल उसे भी उसके साथियों के पास पहुचा देगा। गन तो -खुद उसके हाथ में भी है । फिर वही क्यों नहीं दुश्मन को मार डालता ।' ऐसा ख्याल दिमाग में अते ही गन के - ट्रिगर पर मौजूद उंगली में हरकत हुई ।


"धांय ।" -



एक गोली चली ।



मगर । वह उसकी अपनी गन से नहीं बल्कि हैरी की गन ने उगती थी ।


उसकी अपनी गन तो बेचारी खुद जख्मी हो गई थी।


परिणामस्वरूप वह उसके हाथों से निकलकर लाशों के बीच जा गिरी । हैदर अली के दोनों हाथ बुरी तरह झनझना रहे थे । '

हाथ ही क्यों, दिमाग तक झनझना रहा था उसका !!!

जिस्म जूडी के मरीज की मानिन्द कांप रहा था ।

चेहरे पर चल रहा था मीत का कत्थक !


उसके ठीक विपरीत हैरी के गुलाबी होंठो पर विधिक रही थी मासूम और मोहक मुस्कान । यह मुस्कान हैदर अती को मानों पागल कर गई । हलक फाड़कर दहाड़ उठा-- "मुझे भी क्यो नहीं मार डालता हरामजादे? "






"क्योंकि तुझसे मुझे मुहब्बत हो गई है ।" उसकी मुस्कान गहरी से गई ।


हैदर अली की मुख-मुद्रा से साफ जाहिर था…......कहना तो जाने वह क्या-क्या चाह रहा है मगर गुस्से की ज्यादती के कारण मुहं से लफ्ज नहीं निकल पा रहे । अतत: हैरी ने ही कहा- दरवाजे की तरफ़ चलो ।”

""..न ........न चलूं तो?" वहुत ही अनाडीपन के साथ पूछा उसने ।


"तो मैं तुम्हारा मरने का शोक पूरा कर दूंगा ।" लहजा बहुत सख्त था ।


हैदर अली समझ नहीं पाया यह चाहता क्या है । वहीँ समझने के लिए 'हैरी' के अदिश का पालन किया । दरवाजे की तरफ बढा । 'हैरी' गन संभाले उसके पीछे था ।

केवल एक गज पीछे ।

दरवाजे के नजदीक पहुचकर हैदर अती ठिठक गया ।


"इसे खोलो ।" उसने हुक्म दिया ।

हैदर अली ने झांक कर सलाखों के उस तरफ देखा ।


कंट्रोल रूम के फर्श पर पडी कैप्टन इरशाद की लाश पर नजर पड़ते ही जेहन को अटका लगा ।

अगले पल मानो सारी सिच्चेशन समझ में जा गई । वह पलटा ।

हैरी की तरफ देखकर मुस्कराया । बोता…"मैं संमझ गया ।"

"क्या समझ गए?" । '

"तुमने मुझे क्यों नहीं मारा?"


"बक्रो ।"


"क्योंकि तुम मुझे मार ही नहीं सकते ।"

"क्यों नहीं मार सकता ।"

"मैं मर गया तो हमेशा के लिए यहीं कैद होकर रह जाओगे । धरा' रह जाएगा तुम्हारा यहां से निकलने का मंसूबा । वह मंसूबा जिसके लिए है तुमने मेरे इतने साथियों का खून बहाया । इतनी उठा - पटक की ।"

"वहम है तुम्हारा ।"

"वहम है तो दिखाओ अपनी मलखानी । मार डालो मुझे । करो मेरा शौक पूरा । मेरी जिंदगी तुम्हारी उंगली की हल्की जुम्बिश की थार पर है । करों हरकत । लुढका दो मुझे भी ।"

एक पल के लिए लाजवाब हो गया हैरी' । फिर संभलकर बोला-----" दरवाजा खोल रहे हो हैदर अली या नहीं ।"


" नहीं ।" हैदर अली के जबड़े कस गए।


“घांय !!"


हैरी की गन ने केवल एक बार खांसा ।


गोली हैदर अली के कान से रगड़ खाने के बाद जगंते की एक सलाखं से टकराकर शहीद हो गई ।



"यही तो. . यहीं तो कहना चाहता हूँ मैं हूँ' हैदर अली ने बगैर जरा भी खौफ खाए कहा…"तुम मुझे डराने की भले ही चाहे जितनी ' कोशिश करों मगर मार नहीं सकते । ये गोली दाएं कान के नजदीक से निकली है, अगली बाएं कान के नजदीक से निकालोगे । सीने पर गोली. नहीं मार सकते .मेरे । मैं मर गया तो इस दरवाजे को खोल सकने वाला आखिरी शाख्स मर जाएगा । च. . .च. . .च. . . ।की हैदरअती ने उसकी हैंसी-सी उडाई---- “इतनी मर्दानगी दिखाने के बावजूद कितनी बड़ी मजबूरी में फंस गए ।"


इसमें शक नहीं, हैदर अली ने- ठोस हकीकत कहीं थी !!


बाहर निकलने का हैरी के पास और कोई जरिया नहीं था ।


कुछ देर हैं लिए तो भन्ना कर रह गया लडका । चेहरा भभकता चला गया । फिर, हलक से लपज नहीं,अाग निक्ली ---- "मौत और जिंदगी के बीच एक फासला होता है । आमतौर पर लोग उस फासले के बीच नहीं फंसते । फंसना भी नहीं चाहते मगर मुझे लगता है-----, उस 'ब्लेक होल' में फंसना चाहते हो ।"


"क्या मतलब?"


"ये रहा मतलब ।" दांत र्मीचकर कहने के साथ हेरी ने ट्रिगर दबा दिया

हैदरअली के हलक से चीख निकली !!!!!


गोली उसके घुटने में लगी थी । धाड़ से पथरीली जमीन पर गिरा ।


"अब बोल ।" हैरी गुर्राया---" केवल डराया तो नहीं तुझे कान को स्पर्श करती तो नहीं निक्ली गोली और देख----: ये दूसरी गोली भी कान से स्पर्श करती नहीं निकलेगी ।" कहने के साथ उसने दुबारा उंगली को जुम्बिश दी । इस गोली ने उसका दुसरा घुटना भी तोड दिया था ।

खून से लथपथ वह जमीन पर कीडे की तरह तड़पता डकराता रहा ।


हैरी ने यही बस नहीं कर दी ।


क्षणिक अंतराल से उसने दो गोलियां और चंलाई ।




उसके दोनों बाजू कंधों पर झूलकर रह गए ।


बुरी तरह डकरा रहा था वह । डकराहट के बीच ही दहाड़ा-“मारता क्यों नहीं । मार क्यों नहीं डालता मुझें? सीने पर क्यों नहीं चला देता एक गोली ?"



"ठीक कहा था तूने । बहुत मज़बूर हूं मैं केवल सीने पर ही गोली नहीं मार सकता तेरे ।" केहने के साथ हैरी उसके वेहद नजदीक पहुंचा !

बोला - अव तेरी समझ में आया होगा । इसे कहते हैं जिन्दगी का "ब्लेक होल' । जिन्दगी और मीत के बीच का वह फासला जहाँ फंसने के बाद इंसान जिन्दगी से ज्यादा मोत की तमन्ना करने लगता है और मौत अगर न मिले तो वह भी करने को तैयार हो जाता है जो वह जिन्दगी को हासिल करने के लिए तैयार नहीं था ।"


"म. . .मुझे मार डाल । प्लीज कुत्ते. ..कपीने. .......मुझ पर रहम कर हरामजादे. ..... मार डाल मुझे ।" हैदर अली गिड़गिड़ा भी रहा था और उसे गालियां भी बक रहा था ।


"तू जानता है । नहीं जानता तो अच्छी तरह समझ ले…बहुत मजवूत हूं मैं । जब तक ये दरवाजा नहीं खुलेगा तब तक मैं तुझे मरने नहीं दे सकता ।" कहने के साथ उसने गन की नाल पूरी बेरहमी के साथ घुटने के उस होल में घुसेड़ दी जो उसकी गोली ने बनाया था ।


हैदर अली डकराहटों से सुरगेॉ दहल उठी।

नाल को ज़ख्म के अंदर घुमाते हैरी ने कहा…"दरवाजा न खुलने तक मैं तुझे इसी तरह "ब्लेक होल' में फसाएं रखूंगा । देखना केवल ये है --- दरवाजा खोलने की जरूरत ज्यादा शिद्दृत से तुझे पड़ती है या मुझे "


कहां तक सहता हैदर अली ????



इंसान सह भी कितना सकता है ???



जव हैरी ने गन की नाल घुटने से वाहर निकाल कर दुसरे घुटने के जख्म पर रखी तो डकराहटों के बीच हलक से लफ्ज निकलता चला गया -------- " म मममममम..... मेरी जेब में एक रिमोट है ! उसी से खुलेगा दरबाजा !"



सुनते ही हैरी झपटा ! उसके नजदीक बैठा ! तलाशी ली ! रिमोट बरामद किया ! उसका एक वटन दबाते ही दरबाजा खुल गया !



हैरी ने कंटरोल रूम में कदम रखा !






रास्ते में पड़ी इरशाद की लाश में ठोकर जमाई !



हैदर अली गिड़गिड़ा उठा ---- "कहां जा रहे हो हैैरी ? प्लीज .......... अब तो मुझे मार डालो !


हैरी उसकी तरफ पलटा ! चेहरे पर करूरता के भाव थे ! वापस आया !


उसके नजदीक पहुंचा ! झुका !

उसकी एक टांग पकड़ी और घसीट कर कंट़ोल रूम में लाता हुआ वोला --" मेहरवानी हासिल करने के लिये तुझे अभी यहां से बाहर निकलने का रास्ता बताना होगा !


इस बार हैदर अली ने कोई हील हुज्जत नहीं की !


असल मेॉ जिंदा रहने की ताकत अब खत्म हो चुकी थि ! इस ने बता दिया --- दाईं तरफ रखे कम्पूट के 'की बोरड पर मौजूद लाल बटन को दबाते ही हॉल का एक पत्थर अपनी जगह . से हट जाएगा ।

और बस........!

उसके बाद 'हैरी' ने उसे ज्यादा नहीं सत्ताया । . .

वह समझ सकता था -हैदर अली किसी किस्म की चाल चलने या झूठ बोलने की अवस्था में नहीं रहा है ।


सो, उसके बताते ही हैरी की गन गरजी।


गोली हैदर अली के सीने में जा ' धंसी । मुक्ति मिल गई उसे ।


उसकी लाश की तरफ एक बार भी- तो पलटकर नहीं देखा हैरी ने। झपटकर की बोर्ड के नजदीक पहुचा ! आंखें लाल बटन पर स्थिर थीं । उसी बटन पर, जिस पर उगंली रखते ही दरवाजा खुल सकता था ।



मगर ऐसा किया नहीं उसने। जानता था-दरवाजा खुलते ही उसका सामना हजारों सैनिकों से होना है ।


सबसे पहले उसने 'प्रिंटर’ की बगल में रखी टॉर्च उठाई । फिर, अपने काम की किसी एन्य वस्तु की तलाश में चारों तरफ नजरे घुमाई । एक पेटी में रखे हैडग्रेनेड पर नजर पड़ते ही आंखें चमक उठीं । झपटकर पेटी के नजदीक पहुचा ।


कुल चार हैँडग्रेहेड थे । तीन जेब में डाले, एक उठाया ! कुछ देर जाने क्या सोचता रहा और फिर उसका सेफ्टी पिन निकालकर उस दीवार की तरफ उछाल दिया जो उससे दूर थी !!!!


"धड़ाम ।"



एक जोरदार विस्फोट से सास इलाका दहल उठा ।



आग , धुएं और धुल का गुब्बार-सा उठा । पत्थर" एक-दूसरे से अलग होकर छितराए । एक वहुत बड़ा होल हो चुका था वहॉं !!!


एक आवाज गुंजी ---- “चारों तरफ घेरा डाल दो । वह इधर से निकलने की कोशिश कर रहा है !



हैरी मुस्कराया । उन्हें इसी भृम में तो फंसाना चाहता था वह ।


उधर कोलाहल मचा हुआ था इधर हैरी ने एक हाथ का अंगूठा लाल बटन पर रखा, दूसरे में दबी गन से वे सारे बल्ब शहीद कर डाले जो वहां रोशनी किए हुए थे । अंधेरा होते ही दूसरे हाथ के अंगूठे ने लाल बटन दबा दिया ।

एक विशाल पत्थर सरसराकर अपने स्थान से हट गया ।

वह दिशा विस्फोट की दिशा के ठीक विपरीत थी । अगले पल हैरी कंट्रोल रूम से बाहर था ।

वहां. जहा दूर-दूर तक जंगल ही जंगल था । चारों तरफ अजीब-सा कोलाहल । जिस तरफ़ विस्फोट हुआ था उस तरफ़ बीस-पचीस टॉर्चे चमक रही थी । हैरी विपरीत दिशा में भागा । उसने महसूस किपा…वह किन्हीं झाडियों में घुसता चला गया है ।

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खुद को झाडियों में छुपाकर हैऱी अपनी धोकनी के सामान चली सांस पर काबू पाने की कोशिश करने लगा ।

अपने चारों तरफ उसे सैनिक ही सैनिक महसूस हो रहे थे।


फिलहाल उसे इन सबसे निपटना था !!!!




जिन झाड़ीयों मेॉ वो छुपा था ,, उसकै पीछे से भी सेनिक भागते चले आ रहे थे !!! हैरी यह ही सोच रहा था कि कोई झाड़ीयोॉ में ही ना गुस जाये !




"ठहरो" अचानक जंगल में एक अस्वाज गूंज उठी ।

कोलाहल एकदम शांत हो गया । टारचें अभी तक रोशन यी, चारों तरफ से आते सैनिक स्क गए । वह आवाज पुन. गूंजी --" इस जगह पर सैनिक एक घेरा वना ले ! यहां घेरा बनाना टुकड़ी नंबर दस का काम है ! घयान रहे , दुश्मन के पास गन है !!!"


और हैरी ने देखा उसके चारों तरफ सेनिकों का घेरा बन गया है !!!



बाकी सैनिक आगे बढे, यू समझना चाहिए कि आगे बढने वाले सेनिक भी अब दस नम्वर टुकड़ी के घेरे में थे !!!


हैरी को यह समझने में देर नहों लगी कि वो बुरी तरह घिरा है। वह चुपचाप झाडियों में पडा रहा।


टारचों के परकाश में वहुत से सैनिक उसकी तरफ बढ़ रहे थे !!!


हैरी अच्छी तरह समझ चुका था कि अब बिना किसी तरह का खून खराबा किए किसी भी तरह इन लोगों के बीच से नहीं निकल सकेगा । उसने कुछ निश्चय किया और संभलकर बैठ गया ।

"पांच नम्बर की टुकडी यंहा दूसरा घेरा.............. ।"

अभी पहली आवाज ने दुबारा कुछ कहना ही चाहा था कि


उफ!!! कमाल कर दिया हैरो ने ।


उसकी गन गरज उठी- मंजिल थी वह आवाज ।


एक जबरदस्त चिख से जंगल दहल उठा । आवाज पर हैरी ने अचूक निशाना लगाया या और निशाने के जवाब में ----

" रेट . रेट रेट . . ।"

" रेट रेट रेट . ...।"



चारों तरफ से गने गर्ज उठी , मगर वाह रे हैरी !!

वह उन झाडियों में अब था कहां?



आवाज पर गोली चलाने के साथ ही वह किसी चिते के समान झाड़ियों मेॉ से उछल कर दूर जा गिरा था ! इसके साथ ही उसने अपने मुह से इतनी जोरदार चीख निकाली थी की गनों की आवाज को वेधकर सैनिकों के कानों तक पहुचे । इस बार ज़मीन से चिपके हैरी ने एक कमाल और दिखाया। भयानक फुरती से उसने अपने सामने चमकती चार 5 टारचें फोड़ डाली, यह काम करते वक्त वह हवा में उछला और साथ ही चीखा "सब अपनी टारच बुझा दे, इससे दुश्मन को हमारी मौजूदगी का आभास मिल रहा है ।" उसके मुंह से निकलने बाली ये आवाज ठीक उस आवाज से मिलती थी , जिसके आदेश पर दस नम्बर की टुकड़ी ने घेरा वनाया था !!!!! जिस आबाज को उसने हमेशा हमेशा के लिए खामोश कर दिया था !


अंधेरे में किसी को क्या मालूम के उन्हें इस आवाज मे हुकम देने वाला मर चुका है !!!




हैरी के इस आदेश का तुरंत पालन हुआ सारी टारचें बुझ ' गई । हैरी बडी तेजी के साथ कोहनियों के वल एक तरफ क्रो रेंगा ! साथ ही साथ उस कमांडर की आबाज की नकल करता हुआ बोला "हमें सतर्कता से अगे बढना है दुश्मन वहुत चालाक है सब अपनी-अपनी जगह पर मुस्तैदी से ठहर जाए । आगे बढ़ने की जरूरत नहीं, दुश्मन कहीं आसपास ही है ।"



उसकी इस आबाज के बाद चारों तरफ गहरा सन्नाटा छा गया !



हैरी को अपनी चाल कारगर --सी नजर आने लगी !!!!

अंधेरे के कारण कोई भी सेनिक इस हकीकत को नहीं जान सका था कि इस आवाज का मालिक उनका अफसऱ ईशवरपुरी में बैठा यमराज के हाथ पांव जोड़ रहा है !!!! सब यही समझ रहे थे कि आदेश जो हैरी अपने मुंह से जारी कर रहा था , उसी कमांडर के हैं !!! कितुं हैरी जानता था इस किस्म का धोखा ज्यादा देर ना दे सकेगा , इसलिये तेजी से रेगता भी जा रहा था! उसका इरादा घेरे से निकल जाने का था !!!!


उसी तरह रेंगता हुया हैरी फिर चिखा -----" ये तो हम भी जानते हैं कि जंहा कहीं भी हो , अभी तक घेरे में हो , अगर जान वचाना चाहते हो तो आत्मसमर्पन कर दो !!!



हैरी के मुंह से निकली आवाज जगंल में गुंज कर रह गई !!!!!

उसके बाद कहीँ से कोइ आवाज नहीं !

हैरी अंधेरे में तेजी के साथ रेंगता जा रहा था । अचानक वह बड़े पत्थर से जा टकराया। घूमकर पत्थर के पीछे आ गया । कमांडर की आवाज में कुछ न कुछ बोलकर वह सैनिकों को उलझाए रखना चाहता था, इसलिए फिर बोला----" तुम्हें एक मौका और देते हैं, जहां भी हो आत्मसमर्पण कर दो , वरना जिस्म गोलियों से छलनी हो जाएगा ।"


फिर सग्नाटा ।


थोडी देर बाद हैरी के कानों में किसी दूसरे सैनिक की आवाज़ पड़ी ---- " साहब, मेरे ख्याल से वह मर गया है । जिस वक्त उसने आपके उपर गोली चलाई थी , उस वक्त हमने फायर किए थे ! उसकी चीख भी गुंजी थी !!!


तभी दुसरी छोर से एक और सेनिक बोला…“उसकी चीख मैंने भी सुनी थी कर्नल साहबा लगता है आपकी आवाज पर चलाई गई गोली तो बेकार गई, लेकिन हमारी गोलियों ने उसे मार डाला है । इजाजत हो तो टॉर्च जलाकर अागे बढे़!! "



"नहीं ।" पत्थर की बैक में पड़ा हैरी एकदम कर्नल की आवाज़ में बोला --"ऐसी बेवकूफी मत करना , चीख तो हमने भी सुनी थी , लेकिन वह हमें धोखा देने के लिये भी चिखा हो सकता है !"


" तो हमें आदेश दीजिए सर !" चौथी दिशा में एक आवाज गूंजी --" हमें क्या करना है !"



"सिर्फ तुम. ..बाकी कोई नहीं, टार्च जला तो लो !" उसने चौथी दिशा में ही गन तानकर कमांडर की आवाज में कहा ।


इस आवाज के गूंजते ही चौथी दिशा से टॉर्च रोशन हुई ।


और कमाल कर दिया हैरी ने ।


- बडी ही खतरनाक लडाई लड़ रहा था इस वक्त वह । उसने टार्च चमकते ही पठार कर दिया । शीशा टूटा, चमकने वात्ती टॉर्च का अस्तित्व हमेशा के लिए खत्म हो गया ।

"रेट...रेट...रेट... ।"

गनें फिर गरज उठी । सारी गोलियां पत्थर ने अपने माथे पर सहन की, लेकिन हैरी इस तरह चीखा मानो कोई गोली उसे भी लगी हो । इस तरह से चीखने के साथ ही उसके मुह से पुन: कर्नल की आवाज म
निकली …“इसको चारों तरफ से भागकर पकड लो ।"


और -चारों तरफ से सेनिक उसकी तरफ़ झपटे । हैरी बड़ी तेजी के साथ रेंगता हुआ पत्थर से दूर हो गया । चारों तरफ से भागकर सैनिकों ने उस पत्थर को देर लिया था और इस बीच हैरी भी जमीन - से खडा होकर सिपाहियों में ही मिल गया था । "


"यहां तो एक पत्थर पड़ा है कर्नल साहब, अन्य कोई नहीं है ।" एक सैनिक की आवाज ।


"रोशनी करो ।" सैनिकों के बीच खड़े हैरी के मुंह से निकला । एक साथ अनेक टार्च रोशन हो' गई । वह विशाल पत्थर जिसके पीछे अभी कुछ देर पाले तक खुद हैरी था, प्रकाश से नहा गया ।

" "यहां तो कोई नहीं है ।" किसी सेनिक ने कहा ।

विन्तु, अब वहां पर उनृक्री बात का जवाब देने वाला भी कोई नहीं था क्योंकि अवसर अच्छा देखकर हैरी ने अंधेरे का लाभ उठाया और

सैनिकों की भीड़ में से होता हुआ एक तरफ को चला गया । किसी को इस बात का गुमान तक ना था कि दुश्मन उनके बीच में से होता हुआ निकल रहा है !"



अभी हैरी पूरी तरह उनके बीच से निकल नहीं पाया था कि एक अन्य सैनिक की आवाज गुंजी ---" अब क्या हुक्म है कर्नल साहब ?"



इस बार हैरी ने अपने मुंह से कोइ आवाज नहीं निकाली !!!!



अव सैनिकों की पकड़ से दूर हो जाना चाहता था !!


अंधेरे ने काफी मदद की !


फिर दौड़ता चला गया !


काफी दूर निकल कर बीच बीच में टार्च की रोशनी जलाकर रास्ता देखता जाता !!!!!!!





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करीब एक घंटे बाद हैरी हौले से चौंका !!!


दो लाल बिंदु चमकते नजर आए ।


उसने ध्यान से देखा, वे विंदु जमीन से कोई दो फीट ऊपर और एक-दूसरे से करीब दो गज की दूरी पर थे । कुछ देर तक अपने स्थान ' पर चुपचाप खडा देखता रहा और समझने की कोशिश करता रहा कि वे बिंदु असल में हैं क्या? बिंदु अभी उससे काफी दूर थे । जब काफी ध्यान से देखने पर भी नहीं समझ पाया तो सतर्क होकर बिंदुओं की तरफ बढ गया । कुछ दूर जाने के बाद उसकी समझ में जाया कि वे दोनों बिंदु अन्य कुछ नहीं जीप की बैक लाइटे है । उन लाल लाइटों में जीप की नम्बर प्लेट भी चमक रही थी । नम्बर प्लेट देखते ही हैरी ये भी समझ गया कि वह जीप "मिलिट्री जीप' है । इतनी बात समझते ही वह और ज्यादा सतर्क से उठा । उसके दिमाग में फौरन यह विचार ' कौंध गया था कि जब जीप यहाँ खडी है तो निश्चय ही सड़क भी कही आसपास होगी । बड़ी सावधानी से हैरी उस दिशा में बढा । उसने रेडियम डायल में टाइम देखा…सुबह के चार बजने वाले थे । वह जीप के बेहद करीब पहुंच गया । करीब पहुंचकर जीप के आसपास दिखते कई साए देखे । अब उसने खड़ा होकर जीप की तरफ बढना मुनासिब नहीं समझा, लिहाजा रेंगकर उस तरफ बढने लगा । दस मिनट बाद जीप के इतना निकट पहुच गया कि अगर चाहे तो खडा होकर दो -तीन . लंबे कदमों में जीप को जा पकड़े, सांस रोके वह जमीन पर पड़ा रहा ।

दो सेनिक जीप से काफी दूरी पर एक-दूसरे से विपरीत दिशा में पहरा दे रहे वे । एक सेनिक जीप से टेक लगाए खड़ा था । जीप के अंदर से

किसी के बोलने की आवाज आ रहीं थी ।



कदाचित जीप के अंदर बैठा कोई व्यक्ति वायरलेस पर किसी से बात कर रहा था । अगर 'हैरी' वायरलेस पर कौने वाली बात सुनंना चाहता तो बड़े आराम से सुन सकता था । जहाँ वह लेटा था, वहां आवाज बिल्कुल साफ़ आ रही थी, किन्तु 'हेरी' का दिमाग तो किसी और ही जगह चकरा रहा था । वह जानता था कि सुबह होने वाली है, सारा वातावरण, प्रकाश से जगमगा उठेगा । अंधेरा उसके लिए जितना ' लाभदायक साबित हुआ है, वह जानता था कि प्रकाश उससे कही ज्यादा खतरनाक साबित होगा । इस अंधेरे का उसे भरपूर लाभ उठाना चाहिए , यही सोचकर वह अपनी कोहनियों के वल किसी सांप की तरह पहरे पर खड़े अकेले सैनिक की तरफ रेंगा ।

पांच मिनट बाद 'हेरी' ऐसी जगह पडा था जहाँ वह सेनिक चहलकदमी करता हुआ आया करता था । सेनिक अपने नियमानुसार टहलता हुआ 'हैरी' के करीब जाता जा रहा था । सेनिक ठीक 'हैैरी' के पास जाकर पलटा और उसके पलटते ही....... ।


जैसे कोई गोरिल्ला झपटे ।


इस तरह झपटा 'हैरी' । गन और टार्च उसने वहां छोड़ दी थी जहाँ जम्प लगाने से पहले लेटा था । । उसका बायां हाथ ढक्कन बनकर सेनिक के मुंह पर चिपक गया । दायां हाथ सर्प की तरह लिपटा था उसकी गर्दन में । सेनिक है मचलने की कोशिश की, चीखना चाहा ।


किंतु बेचारा सेनिक ।


वह क्या जानता था कि वह किस जल्लाद के पंजे से फंसा है? हाथ ' न सिर्फ मुंह के लिए ढक्कन वन गया बल्कि सीलबंद ढक्कन कहे तो ज्यादा बेहतर है । उसके कंठ से निकली चीख के बाहर निकंलने का . तो प्रश्न ही दूर , हवा तक मुंह के रास्ते आवागमन नहीं कर सकती थी । मचलने की कोशिश भी बेकार, गले में लिपटी बांह शेषनाग का कसाव वन गई । सांस लेने की समस्त नसे बंद हो गई !!


तीन मिनट तक विना आक्सीजन के फढफ़ड़ाता रहा वह ऐसे जैसे जल विन मछली।


फिर ठंडा यह गया । सारा भार 'हैरी' के ऊपर पड़ गया । आत्मा के अभाव में जिस्म ठंडा पड़ चुका था । आंखे बाहर को उबल चुकी थी । जब अच्छी तरह से 'हेरी' को विश्वास हो गया कि वह मोक्ष प्राप्त कर चुका है तो खदेड़ता हुआ उसे उधर ही ले गया जिधर उसकी टार्च और गन पडी थी । दो मिनट तक 'हैरी' ने अंधेरे में अपनी कारस्तानी की और..........

और तीसरे मिनट का श्रीगणेश होते ही वह बेयड़क जीप की तरफ बढा ।






इस वक्त उसके जिस्म पर उसी सेनिक के कपडे थे । जीप के पास जाकर उसने देखा । - कुछ देर पहले जो इंसान जीप के अंदर बैठा वायरलेस पर बाते कर रहा था वह अब जीप से बाहर खडे दुसरे सेनिक से कुछ बातचीत कर रहा था । उसे आता देख उनमें से एक बोला क्य, बात है हमीद?"


हैरी समझ गया कि जिस आदमी से ऊपर वाले को मुहब्बत हो चुकी है या जिसे सांस रोककर वह मार चुका है उसका नाम हमीद था । उसकी बात का कोई भी ज़वाब दिए बिना हैरी ने अागे बढकर जीप के अंदर देखा । वह खाली पडी थी । "क्या बात है हमीद, जवाब क्यों नहीं, देते?" उसी सेनिक ने पूछा ।


"अभी देता हू ।"



"अरे तुम्हारी आवाज ........!"



"मेरी नहीं अपने जीवन के आखिरी समय में सिर्फ इसकी आवाज सुनो ।" कहने के साथ हैरी ने दो बार ट्रिगर दबाकर गन को छींकने के लिए मजबुर कर दिया । गन से निकली गोलियां उन दोनो के लिए मौत का परमिट वन गई । कुछ' सोचने और समझने की असफ़ल कोशिश करते हुए वे मौत के परमिट पर सवार होकर ईश्वरपुरी की तरफ दौडे । उधर दूर खड़ा सेनिक गन की आवाज सुनकर सतर्क हुआ । लेकिन तब तक हैरी उस तरफ घूमकर एक ओर फायर कर चुका था । गोली उस सेनिक की रायफल पर लगी । रायफल को इतनी जोर से झटका लगा कि कुंदा उसके जबड़े पर लगा । अपने मुह से चीख निकालता हुआ वह गिरा । रायफल उसके हाथ से छूटकर अंधेरे में कहीं दूर जा गिरी यी ।


सैनिक ने उठना चाहा , लेकिन उसने महसूस किया किसी का भारी बूट उसकी छाती पर रखा है , एक गुर्राती --सी आवाज उसके कानों में पड़ी -- " अपने साथियों में से सिर्फ तुम जिंदा हो ! शेष उपर जा चुके हैं , अगर तुम भी मौत से कुश्ती करने की कोशिश करोगे तो ये गन तुम्हें भी उपर पहुंचा देगी !!!"


जाहिर है --- सैनिक मरना नहीं चाहता था !!!!








ढीला पड़ गया, लेकिन इस बात पर उसे घोर आश्चर्य हो रहा था कि दुश्मन जिन्न की तरह अचानक कहाँ से प्रकट हो गया । उसने ' देखा एक धुंधला-सा साया उसकी छाती पर पैर रखे खडा था । पैर का दबाव इतना ज्यादा था कि उसे सांस लेने में कठिनाई का अनुभव हो रहा था उसने देखा इस साये के हाथ में एक गन भी थी । अभी वह कुछ बोलना ही चाहता था कि गन की नाल बडी जोर से उसकी पसलियों में पडी । हडिृडयां चरमराकर रह गई । साथ ही आवाज ---- "बचना चाहते हो तो जो मैं पूछूं उसका जवाब दो ।”


सैनिक जान चुका था कि इंकार का मतलब मौत का परमिट खरीदना होगा । बोला------'' आ. . .आ. . पूछिए।"


"हिन्दुस्तान का बॉर्डर, यहाँ से कितनी दूर है?" उसका पहला सवाल ।


"ज्यादा नहीं, बस थोडी दूर !"

"चलो ।" वह उसके सीने से पैर हटाकर बोता-----" हाथ ऊपर उठाकर जीप की तरफ़ चलो ।"


ऐसा ही हुआ । सेनिक हाथ ऊपर उठाए जागे-जागे चल रहा था और उसकी पसलियों से गन सटाए हैरी ।

जीप के पास जाकर जब उसने अपने दो साथियों की लाश देखी तो अपनी रीढ़ की हड़डी में सिहरन-भी महसूस हुई । वह समझ गया कि उसको कवर करके चलने वाला व्यक्ति किसी भी इंसान को पलक झपकते ही मार देने में अभ्यस्त है ।



हैरी की व गुर्राहट-"ड्राइविंग सीट पर बैठकर जीप स्टार्ट करो और बार्डर की तरफ चलो ।"


बेचारा सेनिक, बेरंग लिफाफे की तरह मजबूर ।


मरता क्या न करता । यह हुक्म भी माना । वह ड्राइविंग सीट पर बैठा !!

हैरी पसलियों से गन सताए बराबर में । उसके जीप स्टार्ट करते ही हैरी एक वार फिर गुर्राया--'"ध्यान रहे. जीप चलानी मुझे भी आती है ! "


किसी भी तरह से चलाकी तुम्हारी मौत से कुश्ती बन सकती है ! बिना कोई गलत हरकत करे, सही रास्ते पर जीप ले चलो !!!



ऐसा ही हुआ भी ! मुश्किल से दस मिनट जीप कच्चे रास्ते पर चली !! इसके बाद सड़क पर आगई !!! फुटटफाथ पर लगे पत्थरो को पढ़ कर हैरी ने जान लिया की बार्डर की तरफ बढ़ रहें है !



यह जानने के बाद हैरी ने राहत की सांस ली ! बोला ---" जितनी तेज चला सकते हो , चलाओ !"





और सिपाही ने जीप इतनी तेज चलाई की हवा से बातें करती नजर आने लगी !!!!! अभी वह बार्डर से करीब पांच मील इधर थे की अचानक जीप में रखा वायरलैस 'पिक पिक ' करने लगा !!!!


हैरी ने चौंक कर वायरलैस की तरफ देखा !


" गाड़ी रोको !" उसने सैनिक को आदेश दिया !


हुक्म मिलते ही उसने जोर से बरेक पैडल दबाया ! चीखती हुई जीप कुछ दूर फिसलने के बाद रूक गई !!!



हैरी गुर्राया ---" बातें करो ,अगर कोड में गड़बड़ का कोई संदेश देने की कोशिश की तो अपनी जान बचाने की तुम्हारी अव तक की कोशिश पर पानी फिर जाएगा । चलो ।"



कांपते हाथों तो सेनिक ने वायरलेस आन किया और बोला…"मिस्टर डेंजर स्पीकिंग ।"


“धांय !"


इधर सैनिक के मुह से उपरोक्त शब्द निकले उथर हैरी की गन ने चीखकर उसे मुफ्त में ईश्वरपुरी का टिकट थमा दिया, गोली सेनिक के भेजे को फोड़़ती हुई निकल गई थी !!


एक ही पल में जीता-जाता सेनिक लाश में बदल चुका था । वहीं जोर से ठोकर मारकर उसने सेनिक की लाश को जीप से बाहर फेंक दिया और खुद वायरलेस सेट पर झुका !!



दूसरी तंरफ से आवाज अा रही थी… "हेलो० हैलो क्या हुया .....ये गोली की आवाज केसी थी. ......हैलो?”



"बहुत देर से यह सेनिक अपनी जान बनाने की कोशिश कर रहा था ।"' वह किसी शेर की भांति वायरलेस पर चीखा- "तुमने इसकी सारी मेहनत पर पानी फिरवा दिया । तुमसे बात करते वक्त्त तुम्हें खतरे की सूचना देने के लालच को नहीं दबा सका और मिस्टर डेंजर कहकर इसने तुम्हें खतरे की सूचना दे दी । अपनी इस गलती की वजह से मारा गया । अब जब हुम इतना सब जान ही गए हो तो कान खोलकर सुनो ---- इस वक्त जीप तुम्हारे दुश्मन के कब्जे में है । इस जीप में तुम्हारे सारे आदमी मारे जा चुके हैं ।"


"कौन हो तुम."'



" ओह !! अभी भी नाम बताना पडेगा ।"





' हैरी ' ऐसे लहजे कहा जैसे बोलने बाला ' कन्फर्म ' करना चाहता हो !



"यस" उसने पुरी मस्ती में कहा --- " पुरा नाम हैरी आर्मस्टर्ांग !"


" मैं पाकिस्तानी सीकर्ेट सर्विस का चीफ बोल रहा हूं !!!


"ओह !" वह कुछ और मस्ती में आ गया ---- " मेरी फरारी का समाचार तुम तक पहुंच चुका है !


'हैरी' तुम पाकिस्तान से निकल नहीं पाओगे ! खुद को जिंदा रखना चाहते हो तो .......!


"मैं इस वक्त पाकिस्तान में नहीं ---- 'आजाद कश्मीर ' में हूं मिस्टर चीफ ! उस आजाद कश्मीर में जिसे तुम नाम के लिये आजाद कहते हो । कश्मीरियों को बेवकूफ़ बनाने के लिए आजाद कहते हो है असल में तुमने धरती के इस स्वर्ग को गुलाम बना रखा है । अपनी आंखो से देख रहा हूं मैं । चप्पे--चप्पे पर तुम्हारे सेनिक फेले हुए हैं, मगर ये सैनिक अब मुझे तुम्हारे पाकिस्तान की सी मा में रोक नहीं पाएंगे । बहुत जल्दी से बॉंर्डर क्रॉस करके हिन्दुस्तान पहुच जाऊंगा।

उस देश में जिस देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ़ तुमने भयानक साजिश रची है ।" '


"हमारी कुछ समझ में नहीं आ रहा । तुम कहना क्या चाहते हो ?”


"बही कहना चाहता हू मिस्टर चीफ जो छावनी नम्बर बासठ की कैद में रहकर जाना है और यह भी " जानता हू कि अब. तुम मुझे झूठा साबित करने की कोशिश करोगे । दुनिया को यह बताने की कोशिश करोगे कि 'हैरी' विकास का दोस्त है, इसलिए पाकिस्तान पर झूठा आरोप लगा रहा मगर शायद तुम भूल रहे हो-हैरी या विकास को किसी का समर्थन जुटाने की जरूरत नहीं पड़ती । हमे अपनी लडाई अकेले लड़नी जाती है । भले ही सारी दुनिया 'हेरी' को झूठा समझती और कहती रहे मगर ये वादा है मेरा तुमसे-तुम्हारी साजिश के परखच्चे उड़ाकर ही दम लूंगा ।" अंतिम शब्द कहते-कहते 'हेरी' का चेहरा भभकने लगा था । थोडा संभलकर बोला ------" जानता हु, तुम ये वार्ता इसलिए लंबी करना चाहते हो ताकि मुझे बातों में उलझाकर मेरी दिशा और दूरी जान सको । मगर नहीं चीफ महोदय, अपनी इस कोशिश में मैं भी कामयाब नहीं हो सकोगे तुम ।" कहने के साथ एक झटके से.उसने वायरलैस आँफ कर दिया ।



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Congrats Mam for new story
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Maine 5 star de diye thread ko.
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सूर्य देव ने अभी दर्शन नहीं दिये थे मगर पूर्वी गगन की मांग में मानो सिंदूर भरना शुरू हो गया था !


रात को दो वजे सोने के बावजूद वह सुवह पौने पांच बजे उठ जाता ! कारण केवल यह नाजारा ही था ! उठने में अगर कुछ लेट हो जाता तो दो ऊंचे - ऊंचे पहाड़ों के बीच से सूर्य झांकने लगता !!!


..... यह नजारा उसे बिल्कुल पंसद नहीं था !


अमरीक सिंह !


मेजर अमरीक सिंह ।


पिछले एक महीने से वह चोकी नंबर सेवन का इंचार्ज था ।


पंद्रह जवानों की टुकडी के साथ वहीं तैनात था वह ।


पहाड़ की चोटी पर !



वहां, जहां पहुंचने का कोई जमीनी रास्ता नहीं था । कम से कम हिन्दुस्तान की तरफ से वहां केवल हवाई मार्ग से ही पहुंचा जा सकता था । उसकी दुक्ड़ी के लिए ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर भी हवाई मार्ग से ही आता था । इसके लिए हैलीकॉप्टर को हर रोज वहाँ के तीन चक्कर लगाने पडते थे ।


ठीक सामने ।


इसी पहाड़ जितना उच्चा एक दूसरा पहाड़ था । उसकी चोटी पर स्थित थी….......पाकिस्तानी चोंकी ।"


दोनों के बीच एक किलोमीटर से ज्यादा का फासला नहीं था। " कंटीली तार आदि की कोई बाढ भी नहीं थी वहाँ । दरअसल वैसी कोई बाढ लग भी नहीं सकती थी । दोनों चोटियों के बीच एक दर्रा था । अर्थात यदि इधर से आधा किलोमीटर नीचे उतरा जाए और उधर से आधा किलोमीटर नीचे उतरा जाए तो पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी सेनिक गले मिल सकते थे ।


मगर ।


राजनीतिज्ञ गले कहाँ मिलने देते थे उन्हें । जहाँ वे गले मिल सकते थे अर्थात वह दर्रा तो मानो बॉर्डर बन चुका था । हिंदुस्तानी उसे पार करके सामने वाले पहाड़ की चढाई शुरु नहीं कर सकते थे !



उसी तरह पाकिसतानी इस पहाड़ की चढ़ाई शुरू नहीं कर सकते थे !


दोंनो के हुक्मरानों का हुक्म था ---- ऐसा करने वाले को फौरन गोली मार दी जाए !!!!!


गोलियां तो दोंनों चोकियों के बीच वैसे भी चलती रहा करती थी !



दोंनो तरफ के सैनिकों का मकसद एक ही था -- दुश्मन को यह बताना -- दर्रा पार करने की कोशिश मत करना , हम सजग हैं !



दोंनों ने कई बार एक दुसरे से चौंकी कब्जाने की कोशिश भी की थी !!



अनेक सैनिक मारे भी गये थे ! परंन्तु स्थाई रूप से कभी कोई दुसरे की चौकीं पर काबिज नहीं हो सका !!!!!!!!!!!




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अमरीक सिंह सुबह के नजारों में खोया हुआ था !



कि



तभी .....





"धड़ाम ! धुम्म !



पलक झपकते ही अमरीक सिंह वहां लेट गया जहां खड़ा था !!!!!




वही काम उन पांच सैनिकों ने भी कीया था जो पहाड़ के पांच स्पाँट पर 'शिफ्ट डयूटी' के तहत पहरे पर थे !!!!



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उन्हें लगा --- आज दुश्मन ने आतिशबाजी के लिये भोर का समय चुना है !


मगर नहीं !!!


ऐसा नहीं था !


दुश्मन के तम्बू पर नजर पड़ते ही उन्हें चौंक जाना पड़ा !!!


धूं धूं करके जल रहा था पीकिस्तानी चौंकू का तम्बूं !


भारतीय चौंकी के तम्बूं में सोये सैनिक भी धमाके की आवाज के साथ जग गये !!!


हड़बड़ाकर उठे !!!


सबसे पहसे हाथ अपनी गनों पर गये !!

फिर रेंगते हुये बाहर निकले !!


पाकिस्तानी तम्बूं जलता देखा तो एक ने हैंरत के साथ पूर्व--.-- " कर दिया सालों का काम तमाम ! "



"नहीं यार, हमने कुछ नहीं किया ।" एक ने ज़वाब दिया ।


"तो क्या आपस में ही सिर फोड़ बैठे एक-दूसरे का !"


" ऐसा ही लगता है ।"



" शामोश ।" अमरीक सिंह ने कहा… " यह उनकी कोई चाल भी हो सकती है ।"


कई ने पूछना चाहा…""कैसी चाल?"


मगर आर्मी रूल्ज उन्हें अमरीक सिंह से ऐसा बोई भी सवाल पूछने की परमिशन नहीं देते थे ।


सो, सब खामोश रहे ।


आंखें तम्बूं से निकल रहीं अाग की लपटों पर पर चिपकी हुई थी !



एक और धमाका हुआ ।


बारूद के कणों के साथ पत्थर भी हवा में सन्नाये।


अमरीक सिंह बड़बड़ाया-…"'कमाल है । चोकी को हैडग्रेनेड से नष्ट किया जा रहा है ।"


"सर ।" एक सेनिक ने कहा---- "आरोप शायद हम पर लगने वाला है ।"



अमरीक सिंह खामोश रहा-तो समी खामोश रहे । असल में वह मामले को समझने की कोशिश कर रहा था ।



अभी कुछ भी नहीं समझ पाया था कि उस चोटी से फायरिंग की आवाजें अाने लगी । ऐसा लग रहा था जेसे वहां युद्ध चल रहा ।






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धुंआ छंटा तो देखा ---- एक पाकिस्तानी तेजी से सामने वाले पहाड़ की ढलान से उतर कर दर्रे कू तरफ दौड़ रहा था !


" क्या हुक्म है सर !" एक सैनिक ने पूछा -" कमा दे साले को !"



" नहीं अभी ऐसा कुछ नहीं करना ! उसके हाथ में सफेद झंड़ा है !"


" आपने खुद कहा धा सर ! दुश्मन कोई चाल चल रहा हो सकता !"


इससे पहले अमरीक सिंह कुछ बोलता , सामने वाली पहाड़ी पर दो पाकिस्तानी सैनिक नजर आए ! अपनी गनों से उन्होंने सफेद झंड़े वाले पर गोलियां बरसा दी !!!



शायद कोई गोली उसे लग भी गई !!


तभी तो एक चीख के साथ ढलान पऱ गिरा और फिर दरें की तरफ़ तुढ़कता चला गया ।



दो में से एक सैनिक उसका पीछा करने के चवकर में ढलान पर दौड़ा ।



"थाय ।" अमरीक सिह की गन से शोला लपका।


निशाना सफेद झंडे वाले का पीछा करने वाला सेनिक 'था।


वह मुह के बल ढलान पर गिरा और एक पत्थर से उलझकर रूक गया ।


एक सेनिक ने पूछा- "इसका मतलब शुरू को जाएं सर?"



“हमें सफेद झंडे वाले को बचाना है ।" अमरीक सिंह ने स्पष्ट आदेश दिया-----" हर उस शख्स को मार गिराओ जो उसे मारने की कोशिश करे ।"


"लेकिन सर ।" एक ने उसकी वर्दी को देखते हुए कहा…----" लग तो वह भी पाकिस्तानी सेनिक रहा है ।"


"वह जो भी है पाक आर्मी का दुश्मन है" । अमरीक सिहं बोला---- "मुझें बता है-उनकी चौंकी को उसी ने ध्वस्त किया है । हमसे संरक्षण चाहता है ।"



क्रोई कुछ नहीं बोता ।



बोलने का मौका भी नहीं था।


सामने वाली चोटी पर अब तीन सेनिक नजर आ रहे ये ।


तीनों ने अपनी गनों का मुह दरें में पहुंच चुके शख्स की तरफ घुमा कर खोल दिया !







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हुक्म तो मिल ही चुका था , सो भीरतीय गोलियां सामने वाले पहाड़ पर झपटी !!!!



एक की लाश ढलान पर लुढ़की ! बाकी दो ने जमीन से चिपक कर पोजीशन ले ली !!!!!


अब वे दर्रे में मौजूद शख्स को भूल कर इंडयिन आर्मी पर गोली चलाने लगे !!!!!


जवाब इधर से भी बराबर दिया जा रहा था !!!!


करीब बीस मिनट की गोलाबारी के पाकिस्तानी पहाड़ पर नजर आरहे
दोनों सैनिक भी ढ़ेर होगये ।


सन्नाटा छा गया ।


अब उधर से कोई गोली नहीं चल रही थी !!!


सफेद झंडे वाले का झंडा दर्रे में ही कहीं गिर गया था । अब उसके पास उसकी गन भी नहीं थी । पहाड़ पर चढने की असफल कोशिश कर रहा था वह । असफल इसलिए क्योकि जख्मी होने के कारण चढ़ने में मुश्किल हो रही थी । अमरीक सिंह ने एक नजर उस पर डाली दूसरी पाकिस्तानी पहाड़ की चोटी पर ।


वहां सन्नाटा छाया हुआ था । जैसे कोई जीवित न बचा हो ।



अमरीक सिंह ने पुन: दर्रे की तरफ़ देखते हुए कहा......…"'मैं उसे लेकर आता हूं ।"



"सर ।" एक सेनिक ने कहा-…"'मुमकिन है आपका पहला ही ख्याल ठीक हो । कोई चाल हो यह उन की । ऐसा भी तो हो सकता है कि अाप ढलान पर उतरना शुरू करें और वे सामने से....... ।"


"बको मत राणा 1" अमेरीक सिंह ने उसकी बात पूरी होने के पहले ही गुर्राकर कहा-----". कोशिश उन्होंने की भी तो तुम सब किसलिए हो ।"


सबको सांप सूंघ गया ।


. अमरीक सिंह ने पुन: कहा…"तुम मुझे कवर करोगे ! सबका एक ही काम होगा-----" ढेर कर देना जो मुझ पर या उस पर निशाना . साधने की कोशिश केरे जिसे मैं लेने जा रहा हूं !!!!



सब चुप रहे ।


गन संभाले अमरीक सिंह ने ढलान की तरफ रेंगना शुरू कर दिया । नीचे से जख्मी शख्स भी ऊपर चढने की कोशिश कर रहा था। कुछ देर तब सब कुछ सामान्य रहा । कहीं कोई गडबड नहीं !!!!!





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मगर अचानक पाकिस्तानी पहाड की चोटी पर एक साथ चार सेनिक नजर आए । उनकी गने अमरीक सिंह की तरफ घूमी ही थी कि इधर से गोलियों की बाढ उधर लपकी । उददेश्य था… उन्हें अमरीक सिंह पर गोली चलाने का मोका न देना।


अब । दोनों तरफ़ से गोली की वर्षा हो रही थी ।


ढलान के मध्य में दोनों मिले ।


अमरीक सिंह ने देखा-उसे दो गोलियां लगी थी । एक दाएं पैर की पिंडली मे, दूसरी बाएं कंधे में । जिस्म पर भले ही पाक आर्मी की वर्दी हो मगर असल में वह अमेरिकी था । जख्मी होने के बावजूद वड़ी बहादुरी के साथ पहाड़ पर चढ रहा था वह । उस ववत एक पत्थर से उसका हाथ फिसला था और वह पुन: ढलान पर लुढ़कने वाला था कि अमरीक सिंह ने अपना पैर एक पत्थर की जड में फंसाकर उसे गोद में संभाला ।



अपनी मिचती आंखों को बंद होने से रोकने की कोशिश करते हुये उसने कह्य-“थैंक्यू ........ थैंक्यू दोस्त ।"



" कौन हो तुम !" अमरीक सिंह का पहला सबाल यही था ।



उसने डूबती आवाज में कहा…""हिन्दुस्तान का दोस्त ।"



"वह तो मैं समझ गया । मगर कुछ नाम भी तो होगा ।"

"ह..... हैरी । हैरी आर्मरट्रांग । अमेरिकी हूं मगर ।"



"तुम्हारी बांहों में लग रहा है…अपने भाई की बाहों में हूं ।"



"सो तो हो ही । उधर कैसे फंस गए?"



"कहानी लंबी है । उसे छोडो । वैसे भी पिछली बातों को दोहराने से कोई लाभ नहीं । मेरी मदद करना चाहते हो तो वह करो जो मैं चाहता हू्ं ।"



"क्या चाहते हो ?"



" मुझे बिजय-बिकास के पास पहुचा दो ।"



" कौन विजय-विकास?"


"भले ही तुम न जानते हो मगर राजनगर में उन्हें सब जानते है ।" हैरी बडी मुश्किल से कह पा रहा था…"याद रखना, केवल उन्हीं के पास पहुंचाना मुझे और किसी के पास नहीं ।" कहने के साथ उसकी गर्दन एक तरफ को लुढक गई !

अमरीक सिंह ने उसे झिंझोड़ा ---" हैरी ....मिस्टर हैरी !


वह बेहोश' हो चुका था ।




______________________________
धब्बा ( सुरेन्द्र मोहन पाठक )
शिकारी दो तीन दिन बाद

Last edited by kirank1994 : 22nd March 2016 at 10:04 PM. Reason: update no 16

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